Shiv Tandav Strotram - 11

The Shloka

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा- निपीतदीपित्तकधराधिपेः सहस्रलोचनः ।

अशेषलेखशेखरप्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूषणा मम स्मृतिम् ॥ ११ ॥

Meaning

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीतदीपित्तकधराधिपेः सहस्रलोचनः ।:

जिसका माथा चार दिशाओं में प्रकाशमान है, जिसमें अग्नि (धनञ्जय) की चमक है, जो पीले रंग से दीप्त है, और जो मेघों के स्वामी (शिव) हैं, और जिनके हजार आंखें हैं।


अशेषलेखशेखरप्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूषणा मम स्मृतिम् ॥ ११ ॥:

जो सभी लेखन कला के श्रेष्ठ रूप और फूलों की धूल को धारण करते हैं, और जिनकी राख जैसे पादों का आसन मेरा स्मरण करता है।


Summary

यह श्लोक भगवान शिव के दिव्य रूप का वर्णन करता है। उनका माथा चारों ओर प्रकाशमान है, और वे अग्नि की चमक से युक्त हैं। वे मेघों के स्वामी हैं और उनकी हजार आंखें हैं। वे सभी प्रकार की कला और प्रकृति को धारण करते हैं, और उनका स्मरण करने से मुक्ति मिलती है। राख जैसे पादों का आसन भी इस स्मरण का प्रतीक है।

Meaning of words

Word

Meaning

ललाट

माथा, मस्तक

चत्वर

चार

ज्वलद्

ज्वलमान, प्रकाशमान

धनञ्जय

विजयी, अर्जुन (यहाँ अग्नि के संदर्भ में)

स्फुलिङ्गभा

चमक, तेज

निपीत

पीले रंग का

दीपित

चमकता हुआ

कधराधिपे

मेघों के स्वामी (शिव)

सहस्रलोचन

हजार आंखों वाला

अशेष

सब, संपूर्ण

लेखशेखर

लेखों का शिखर, लेखन कला का श्रेष्ठ रूप

प्रसून

फूल

धूलि

धूल

धोरणी

धारण करने वाली, धारण करने वाली

विधूसरा

धूसर, राख के समान

अङ्घ्रिपीठ

पादों का आसन

भूषणा

सजावट, आभूषण

मम

मेरा

स्मृतिम्

स्मृति, स्मरण