Shiv Tandav Strotram - 9¶
The Shloka¶
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरी ॥ ९ ॥
Meaning¶
जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।:
शिव की जटाएँ, जिन पर लाल रंग के सर्प लिपटे हुए हैं और जिनके फनों की मणियाँ चमक रही हैं, उन पर कदम्ब के फूलों और सिंदूर का तरल पदार्थ लगा हुआ है, जिससे वे सभी दिशाओं (दिग्वधू) के चेहरों पर शोभा दे रहे हैं।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरी ॥ ९ ॥:
मत्त (मदान्ध) हाथी के समान विशाल और चमकते हुए समुद्र (सिन्धु) के समान, सुंदर (मेदुरे) बाघ की खाल (त्वगुत्तरीय) को धारण करने वाले शिव, जो मन को आनंद देने वाले और अद्भुत हैं, वे भूतभर्तरी (भूतों के स्वामी) के रूप में शोभायमान हैं।
Summary¶
यह श्लोक भगवान शिव के अद्भुत और शक्तिशाली रूप का वर्णन करता है। उनकी जटाओं में लिपटे सर्प, कदम्ब और सिंदूर से सने हुए हैं, जो उनकी सुंदरता और शक्ति को दर्शाते हैं। वे बाघ की खाल धारण करते हैं, जो उनकी जंगली और अप्रतिम प्रकृति का प्रतीक है। कुल मिलाकर, यह श्लोक भगवान शिव की महिमा और उनकी अद्भुत सुंदरता का वर्णन करता है।
Meaning of words¶
Word | Meaning |
---|---|
जटा | जटाएँ (बाल) |
भुजङ्ग | सर्प, नाग |
पिङ्गल | लाल, रक्त वर्ण |
स्फुरत् | चमकते हुए, प्रकाशमान |
फणामणि | साँपों के मणियों से जड़े हुए फन |
प्रभा | प्रकाश, तेज |
कदम्ब | कदम्ब वृक्ष, कदम्ब का फूल |
कुङ्कुम | कुंकुम, सिंदूर |
द्रव | द्रव, तरल |
प्रलिप्त | लिप्त, सना हुआ |
दिग्वधू | दिशाओं की पत्नियाँ (सभी दिशाओं) |
मुखे | चेहरे पर |
मदान्ध | मत्त, मद से अंधा |
सिन्धु | समुद्र, नदी |
स्फुरत् | चमकते हुए, प्रकाशमान |
त्वगुत्तरीय | त्वचा से बना हुआ वस्त्र, बाघ की खाल |
मेदुरे | सुंदर, मनोहर |
मनोविनोद | मन को आनंद देने वाला |
अद्भुतं | अद्भुत, आश्चर्यजनक |
बिभर्तु | धारण करने वाला, शोभायमान |
भूतभर्तरी | भूतों के स्वामी, शिव |