Shiv Tandav Strotram - 5¶
The Shloka¶
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरे ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥ ५ ॥
Meaning¶
नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्- कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबन्धुकन्धरे ।:
नए बादलों के समूह, जो तीव्र चमक से अवरुद्ध हैं, और रात के अंधकार को बांधने वाले, कोयल की तरह मधुर बंधन वाले, भगवान शिव अपने कंधों पर धारण करते हैं।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः:
बादलों और झरनों से भरे हुए, भगवान शिव अपने जटाओं में समुद्र को धारण करते हैं, जो चमकते हैं।
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥ ५ ॥:
कलाओं के भंडार और प्रियतम, भगवान शिव, लक्ष्मी (समृद्धि) को धारण करते हैं और संसार को धारण करते हैं।
Summary¶
यह श्लोक भगवान शिव के सौंदर्य और शक्ति का वर्णन करता है। वे नए बादलों, झरनों, और समुद्र को धारण करते हैं, और कलाओं के भंडार हैं। वे लक्ष्मी को धारण करते हैं और संसार को धारण करते हैं, जो उनकी सर्वशक्तिमत्ता को दर्शाता है।
Meaning of words¶
Word | Meaning |
---|---|
नवीन | नए |
मेघमण्डली | बादलों का समूह |
निरुद्ध | रोककर |
दुर्धरस्फुरत् | अतिशय तेज़ चमकते हुए |
कुहू | कोयल |
निशीथिनी | रात |
तमः | अंधकार |
प्रबन्धबन्धु | बंधन करने वाले |
कन्धरे | कंधों पर |
निलिम्प | बादलों से युक्त |
निर्झरी | झरने |
धर | धारण करने वाले |
स्तनोतु | चमके |
कृत्ति | बाल |
सिन्धुरः | समुद्र |
कलानिधान | कलाओं का भंडार |
बन्धुरः | प्रियतम |
श्रियं | लक्ष्मी (समृद्धि) |
जगद्धुरंधरः | संसार को धारण करने वाले |