Shiv Tandav Strotram - 3

The Shloka

धराधरसुता तटे लसद्विलासचेलके दृगञ्चलस्फुरत्करालपलभासुरे दृशाम् ।

दिगन्तरालभूतले प्रवर्तिताण्डवे क्षपाकरोरुचिसभाजनं तनोतु मे शिवः ॥ ३ ॥

Meaning

धराधरसुता तटे लसद्विलासचेलके दृगञ्चलस्फुरत्करालपलभासुरे दृशाम् ।:

पर्वतों की पुत्री पार्वती के किनारे पर, सुंदर केशों वाली, जिनकी आँखों की पलकें चमक रही हैं और जो भयानक रूप से डरावनी हैं, ऐसा देखने योग्य रूप भगवान शिव का है।


दिगन्तरालभूतले प्रवर्तिताण्डवे क्षपाकरोरुचिसभाजनं तनोतु मे शिवः ॥ ३ ॥:

आकाश के विस्तार में तांडव नृत्य कर रहे, क्रोध से भरे हुए और अद्भुत सुंदरता वाले भगवान शिव मुझे प्रदान करें।


Summary

यह श्लोक भगवान शिव के उग्र और सुंदर दोनों रूपों का वर्णन करता है। यह प्रार्थना है कि भगवान शिव, जो पार्वती के साथ हैं और तांडव नृत्य कर रहे हैं, हमें अपनी कृपा प्रदान करें।

Meaning of words

Word

Meaning

धराधरसुता

पर्वतों की पुत्री (पार्वती)

धरा = पर्वत, धर = धारण करने वाला, सुता = पुत्री

तटे

किनारे पर, तट पर

तट = किनारा

लसद्विलासचेलके

सुंदर, मनोहर, शोभनीय केशों वाली

लसत् = सुंदर, विलास = मनोहर, चेलके = केशों वाली

दृगञ्चलस्फुरत्करालपलभासुरे

जिनकी आँखों की पलकें चमक रही हैं, और जो भयानक रूप से डरावनी हैं

दृग् = आँखें, अञ्चल = पलकें, स्फुरत् = चमकती हुई, कराल = भयानक, पलभासुरे = डरावनी

दृशाम्

देखने योग्य, दर्शनीय

दृश्य = देखने योग्य

दिगन्तरालभूतले

आकाश के विस्तार में, दिशाओं के बीच में

दिगन्तराल = आकाश, भूतले = विस्तार में

प्रवर्तिताण्डवे

जो तांडव नृत्य कर रहे हैं

प्रवर्ति = करने वाले, तांडवे = तांडव नृत्य

क्षपाकरोरुचिसभाजनं

जो क्रोध से भरे हुए हैं, और जिनकी सुंदरता अद्भुत है

क्षपाकर = क्रोधित, ओरुचि = सुंदर, सभाजनं = सुंदरता

तनोतु

प्रदान करें, दें

तनोतु = प्रदान करें

मे

मुझे

मैं (कर्ता)

शिवः

शिव

शिव = भगवान शिव