Madhurashtakam - 1¶
The Shloka¶
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अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥
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Adharaṁ madhuraṁ vadanaṁ madhuraṁ nayanaṁ madhuraṁ hasitaṁ madhuram ।
Hṛdayaṁ madhuraṁ gamanaṁ madhuraṁ madhurādhipaterakhilaṁ madhuram ॥
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Meaning / Summary¶
यह श्लोक, पूरे मधुराष्टकम् की तरह, भगवान श्रीकृष्ण के प्रति मधुर भाव (मीठी भक्ति भावना) की एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति है। यह भक्तों को श्रीकृष्ण के अस्तित्व के हर विवरण में दिव्य को देखने के लिए प्रोत्साहित करता है, जिससे एक गहरा और व्यक्तिगत संबंध बनता है। “मधुरम्” की पुनरावृत्ति भगवान की सर्वव्यापी मधुरता पर जोर देती है, यह सुझाव देती है कि उनका सार ही मधुरता और आनंद है, जो गहन प्रेम और भक्ति को प्रेरित करता है। यह केवल भौतिक वर्णन से परे जाकर श्रीकृष्ण के दिव्य गुणों की सराहना करता है जो उनके सभी रूपों और कार्यों में प्रकट होते हैं।
उनके होंठ मधुर हैं, उनका मुख मधुर है। उनकी आँखें मधुर हैं, उनकी हँसी मधुर है। उनका हृदय मधुर है, उनका चलना मधुर है। मधुरता के अधिपति (श्रीकृष्ण) का सब कुछ मधुर है।
मधुराष्टकम् का यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न गुणों को प्रेमपूर्वक वर्णित करता है, और प्रत्येक को अत्यंत मधुर और मनमोहक बताता है। यह उनके होंठ, मुख, आँखें और हँसी जैसे बाहरी स्वरूप के साथ-साथ उनके हृदय और चलने की शैली जैसे आंतरिक गुणों पर भी प्रकाश डालता है, और अंत में यह निष्कर्ष निकालता है कि मधुरता के परम स्वामी श्रीकृष्ण का प्रत्येक अंग मधुरता से परिपूर्ण है।
यह श्लोक, वल्लभाचार्य द्वारा रचित मधुराष्टकम् का एक अंश है, जो भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य आकर्षण का अत्यंत सुंदर वर्णन करता है। यह व्यवस्थित रूप से श्रीकृष्ण के अस्तित्व के विभिन्न पहलुओं, चाहे वे भौतिक हों या आंतरिक, को सूचीबद्ध करता है और प्रत्येक को ‘मधुरम्’ (मधुरता) से विभूषित करता है। उनके होंठ मधुर हैं, जिसका अर्थ है उनके वचनों की मधुरता, उनकी बाँसुरी की धुन और उनके प्रिय भाव। उनका मुख मधुर है, जो उनके मुखमंडल की सुंदरता और शांति को दर्शाता है। उनकी आँखें मधुर हैं, जो दिव्य करुणा, लीला और ज्ञान को प्रतिबिंबित करती हैं। उनकी हँसी मधुर है, जो भक्तों के हृदयों में आनंद और परमानंद उत्पन्न करती है। उनका हृदय मधुर है, जो उनके परोपकारी स्वभाव, उनके असीम प्रेम और उनके इरादों की पवित्रता को दर्शाता है। उनकी चाल मधुर है, जो उनके चलने के मनमोहक और आकर्षक तरीके को चित्रित करती है, जो भी उन्हें देखता है, उसे मंत्रमुग्ध कर देती है। अंत में, श्लोक यह कहकर समाप्त होता है कि चूंकि वे ‘मधुराधिपति’ - मधुरता के स्वामी हैं - उनके बारे में सब कुछ, बिना किसी अपवाद के, मधुर है। यह इस अवधारणा को उजागर करता है कि श्रीकृष्ण अपनी संपूर्णता में मधुरता के प्रतीक हैं, और उनका सार शुद्ध आनंद और आकर्षण है।
This shloka, like the entire Madhurashtakam, is a powerful expression of madhura bhava (sweet devotional sentiment) towards Lord Krishna. It encourages devotees to perceive the divine in every detail of Krishna’s being, fostering a deep and personal connection. The repetition of “madhuram” emphasizes the all-encompassing sweetness of the Lord, suggesting that His very essence is sweetness and bliss, inspiring profound love and devotion. It moves beyond mere physical description to an appreciation of Krishna’s divine qualities that manifest in all His forms and actions.
His lips are sweet, His face is sweet. His eyes are sweet, His smile is sweet. His heart is sweet, His gait is sweet. Everything about the Lord of Sweetness is sweet.
This verse from Madhurashtakam lovingly enumerates various attributes of Lord Krishna, declaring each one to be utterly sweet and charming. It highlights His physical features like lips, face, eyes, and smile, as well as His inner qualities like His heart and His very manner of movement, concluding that every single aspect of Krishna, the Supreme Lord of Sweetness, is imbued with divine sweetness.
This verse from the Madhurashtakam, a hymn by Vallabhacharya, exquisitely describes the divine charm of Lord Krishna. It systematically lists various aspects of Krishna’s being, both physical and internal, and attributes ‘madhuram’ (sweetness) to each one. His lips are sweet, implying the sweetness of His words, His flute playing, and His endearing expressions. His face is sweet, representing the beauty and serenity of His countenance. His eyes are sweet, reflecting divine compassion, playfulness, and wisdom. His smile is sweet, evoking joy and bliss in the hearts of devotees. His heart is sweet, denoting His benevolent nature, His boundless love, and His purity of intention. His gait is sweet, illustrating the graceful and enchanting way He moves, captivating all who witness it. Finally, the shloka culminates by stating that because He is ‘Madhurādhipati’ – the Lord of Sweetness – everything about Him, without exception, is sweet. This highlights the concept that Krishna embodies sweetness in its entirety, and His essence is pure bliss and charm.
Sentence - 1¶
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अधरं मधुरं वदनं मधुरं
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Meaning¶
उनके होंठ मधुर हैं, उनका मुख मधुर है।
His lips are sweet, His face is sweet.
Meaning of Words¶
अधरं | Adharam | ||
होंठ | lips | ||
मधुरं | Madhuram | ||
मधुर | Pleasing, delightful, charming, melodious, or sweet in taste. In this context, it refers to the divine attractiveness and captivating nature. | ||
वदनं | Vadanam | ||
भगवान श्रीकृष्ण का चेहरा, मुखमंडल, जो कृपा और आकर्षण से परिपूर्ण है। | face |
Sentence - 2¶
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नयनं मधुरं हसितं मधुरम्
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Meaning¶
उनकी आँखें मधुर हैं, उनकी मुस्कान मधुर है।
His eyes are sweet, His smile is sweet.
Meaning of Words¶
नयनं | Nayanam | ||
आँखें | eyes | ||
हसितं | Hasitam | ||
हँसी/मुस्कान | smile |
Sentence - 3¶
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हृदयं मधुरं गमनं मधुरं
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Meaning¶
उनका हृदय मधुर है, उनका चलना मधुर है।
His heart is sweet, His gait is sweet.
Meaning of Words¶
हृदयं | Hṛdayam | ||
हृदय | heart | ||
गमनं | Gamanam | ||
गमन/चाल | gait/movement |
Sentence - 4¶
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मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥
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Meaning¶
मधुरता के अधिपति (श्रीकृष्ण) का सब कुछ मधुर है।
Everything about the Lord of Sweetness is sweet.
Meaning of Words¶
मधुराधिपतेः | Madhurādhipateḥ | ||
मधुरता के स्वामी/अधिपति के | of the Lord of Sweetness | ||
अखिलं | Akhilam | ||
सब कुछ/संपूर्ण | everything/all |